Mind & Body
When the mind speaks through the body
मनोकायिक रोग: how unresolved emotion and chronic stress turn into physical illness, and how to break the cycle.
The Connection
Mind and body are one system
Feelings, thoughts and imagination are directly bound to the mind, and they deeply affect the body. Thoughts activate the body’s biological and chemical processes; through them the brain’s messages reach every cell.
Modern life overloads the brain. We push tension down into the unconscious and wear a mask of energy and cheerfulness on the outside. Meanwhile that hidden tension steadily weakens the body’s systems.
The Root
Restlessness of the mind
Tendencies such as desire, anger, pride, attachment and greed (kaam, krodh, mad, moh, lobh) breed envy, fear and resentment. Ayurveda calls the resulting error of judgement pragya-aparadh (प्रज्ञा-अपराध), and it gives birth to stress.
The main cause of stress is the restlessness of the mind (चित्त की चंचलता). Unable to settle, a person struggles to adjust to family and social situations, and the tension starts to appear as physical symptoms, often without the person realising it.
Interactive
From a small hurt to a serious illness
Psychosomatic illness rarely appears suddenly. It grows link by link:
The stress chain: how tension becomes illness
Step through the chain, or select any link. The earlier you break it, the easier it is.
Recognising It
Common signs of a troubled mind
- Excessive worry or fear without reason
- Restlessness and sleeplessness
- Frequent emotional outbursts
- Losing oneself in unreal or imaginary thoughts
- Unusual behaviour, or neglecting oneself and one's dependants
- Weakness, fatigue, hopelessness and a sense of meaninglessness
Debt, conflict, loneliness, guilt, trauma, revenge, failure in love, fear and sadness all carry the seeds of depression.
A gentle self-reflection
This is not a medical test. Tick the statements that feel true for you lately; nothing is saved or sent.
From the Founder's Desk · 2012
The complete original essay on mind, body and illness
Everything on this page grows out of the second part of Mukesh Kumar Mishra's 2012 Hindi essay. It covers Western psychology, psychosomatic illness, depression and the stress chain. Read it in full:
मूल लेख (भाग 2) · Original Hindi text, Part 2
पश्चिम के मनोवैज्ञानिक मन के बहुआयामी व्यक्तिव को तो समझने का प्रयत्न करते रहे हैं,पर आश्चर्य इस बात का है कि मन को वश में करने कि बात शायद किसी ने भी नहीं की. वे अचेतन मन तक तो पहुंचे पर "परामन "(सुपर कोंशियश) की ओर इशारा कम लोगों ने ही किया. उन्होंने मन को क्रियाशील चेतना एवं आत्मा को शांत चेतना के रूप में देखा ही नहीं है.
एक और ध्यान देने योग्य तथ्य है-- अधिकांश मनोवैज्ञानिक, दार्शनिक होने के साथ-साथ डॉक्टर (चिकित्सक) भी थे, इसलिए उनका मुख्या उद्देश्य या टार्गेट मानसिक चिकित्सा पर ही रहा. मन को शांत कर, सच्चिदानंद प्राप्त करने पर नहीं. यहाँ सच्चिदानंद का आशय - etmal : सत, conscious :चित्त तथा bliss :आनंद से है.
यद्यपि उनका इस विषय का अध्ययन एवं उनके विचार सारगर्भित एवं अनेक प्रकार से ज्ञानपूर्ण एवं जानने योग्य हैं.
मन के बारे में पाश्चात्य दार्शनिकों एवं मनोवैज्ञानिकों के विचारों के अनुसंधानों से कुछ नतीजे निकल सकते हैं,-
एक, तो यह की की अधिकांश लोग मन के पृथक अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, वे मन को मिथ्या नहीं मानते.
दूसरे, वे यह भी समझते हैं की मन एक्व्यक्ति तक ही सीमित नहीं है,उसकी शाखाओं का फैलाव दूर-दूर तक है और जड़ें, बहुत गहरी हैं.
तीसरे, मन केवल मनोवैज्ञानिक रोगों के उपचार का विषय नहीं है , उसकी और भी अनेकानेक भूमिकाएं हैं.
चौथे, मन एक क्रियाशील शक्ति है और उसकी मौलिक सृजनात्मक संभावनाएं अनंत हैं.
पांचवे, मन को वश में किये जाने की बात उन्होनें उठाई ही नहीं है.
छठे,पश्चिमी मनोवैज्ञानिकों के कतिपय सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण, मार्मिक एवं लाभदायक हैं. उनके द्वारा किये गए अध्ययनों /अनुसंधानों से यह प्रतीत होता है कि वह कभी-कभी रहस्यमय सत्य के चारों ओर पंख तो फड-फडाते रहे, पर उनका तीर निशाने पर लगता-लगता रह गया.
मानव कि मूल प्रवृत्तियां पाशविक एवं यौन प्रवृति की हुआ करती हैं. किन्तु सभ्य समाज में ऐसी प्रवृत्तियों को खुली छूट नहीं दी जा सकती है. अंतत: उन्हें (प्रवृत्तियों को) दबाने का प्रयत्न किया गया , क्योंकि आधुनिक मानव सरे तनाव अचेतन (un conscious ) में दबाता जाता है और बाहर चुस्ती-फुर्ती का मुखौटा ओढ़े रहता है, परिणामत: तनाव उसके समस्त आंतरिक संस्थानों को कमज़ोर कर देता है. इस दमन के फलस्वरूप अर्धचेतन एवं अचेतन मन में गांठें पड़ जाती है, जो विभिन्न रोगों में उभरकर सामनें आती है. जब कुछ रोगों का उपचार दवा-दारू से नहीं होता तब उनका मूल कारण मानसिक ही मानना पड़ता है. मानसिक विश्लेषण (साइको एनेलिसिस) द्वारा शनै: - शनै: पुरानी घटनाओं को कुरेद - कुरेद कर रोगी को उसकी छुपी हुई कुंठित भावनाओं से मुक्त कराया जाता है, जो साइको - स्प्रिचुअल थैरेपी द्वारा ही संभव हो पता है.इसके द्वारा उसकी (रोगी की) ग्रंथियां पिघलने लगती हैं, और उसका रोग ठीक हो जाता है.
मन और शरीर का बहुत गहरा सम्बन्ध है, भावनाओं और विचारों का मन से सीधा और गहरा नाता है. व्यक्ति की भावनाएं और विचार उसके शरीर पर बहुत गहरा प्रभाव डालते है.
आज तामसिक प्रवृतियों (काम, क्रोध,मद, मोह,लोभ, आदि ) के कारण ईर्ष्या,द्वेष,भय,आक्रोश,लालच बढ़ते जा रहे हैं. फलत: उसमे प्रज्ञा-अपराध उत्पन्न होता है.और यही प्रज्ञा-अपराध मानसिक तनाव को जन्म देता है.
प्रज्ञा-अपराध के ही कारण तनाव उत्पन्न होता है और दीर्घकालीन मानसिक तनाव ही सभी प्रकार की मनोकायिक बीमारियों की जड़ है. यदि इस तनाव का शमन कर मन को शिथिल और स्थिर बनाया जाये तो मनोकायिक और मानसिक बीमारियाँ नहीं होंगीं.
तनाव का मुख्य कारण चित्त की चंचलता है. चित्त की चंचलता के कारण वह सामाजिक एवं पारिवारिक परिस्थितियों में अपने- आपको समायोजित कपने में अस्मार्ठ होता है. वह अपने अन्दर निहित तनाव को अनेकों प्रकार से शारीरिक लक्षणों के रूप में प्रकट करने लगता है, इसे ही मनोकायिक बीमारी कहते हैं.यधपि तनाव के बारे में रोगी को चेतना या बोध नहीं होता,यह वह जान-बूझ कर नहीं करता है बल्कि अचेतन रूप से यह होता रहता है.
मनोकायिक अर्थात मानस रोगों में, इसी अचेतन मन पर, स्प्रिचुअल प्रोग्रामिंग की जाती है. प्रणवाक्षर-ध्यान ही वस्तुत: अचेतन मन की शोधन क्रिया है.
मनोदैहिक विकारों से पीड़ित व्यक्तियों का भावनात्मक और व्यावहारिक पक्ष \ गठन बहुत कुछ मिलता-जुलता होता है.उनका मन,----------
- उनका मन हमेशा सहारा ढूंढता रहता है,
- उसमे आत्मवल एवं आत्मनिर्भरता की कमी होती जाती है,
- उन्हें क्रोध\गुस्सा अधिक आता है,
- वे फिक्रमंद किस्म के होते हैं,
- उनके मन में उमड़ते भावों\अभिव्यक्ति को व्यक्त करने के समुचित वह तलाश नहीं पाते हैं,फलत:वह अपने-आपको विवश और वे-सहारा महसूस करते हैं,
- दमित भावनाओं का लावा उनमे सदैव उमड़ता-सा रहता है,
- अध्ययनों से ऐसे संकेत भी मिले हैं की अनेक मनो-दैहिक रोगियों के मामलों में रोग की उत्पत्ति किसी गहरे व्यक्तिगत आघात से जुडी होती है,
- जीवनसाथी या किसी अतिप्रिय की मौत अथवा किसी बड़ी दुर्घटना के परिणामस्वरूप भी मनोदैहिक रोग हो जाते पाए गए हैं,
- हादसे की प्रकृति से रोग की प्रकृति को जोड़कर भी, अनेकों मामलों में देखा गया है,जैसे पति की अचानक मृत्यु के बाद स्त्री को गर्वशाया का कैंसर हो गया,या
- शिशु के आकस्मिक निधन के बाद माँ को स्तन-कैंसर हो जाने के मामले भी देखे गए हैं,यधपि ऐसे कुछ संयोग ही है,कुछ शोध-चिकित्सकों की मान्यता है की ऐसे मामलों में, मन और तन का सम्बन्ध जुड़ा हो सकता है.
तन की रोग-निरोधक प्रणाली\ इम्यून सिस्टम पर हुए परीक्षण एवं शोधों से ज्ञात हुआ है कि ,-------------------------------------- मानसिक व्यथाओं, मन के द्वंदों का इस प्रणाली पर दुष्प्रभाव पड़ता है अर्थात मानसिक तनाव और दवाव का तन कि रोग-निरोधक क्षमता पर विपरीत परिणाम दिखते हैं..अंतत:रोगों से मुकावला करने की शरीर कि क्षमता कमजोर पड़ जाती है. इस प्रकार यह स्पस्ट है कि रोग बचाव-प्रणाली का यह असंतुलन अनेक रोगों की उपज का महत्वपूर्ण घटक माना जा सकता है,यह शोध की दिशा भी तय कर सकता है.
अधिकांश चिकित्सकों का मत है कि,--- मनोदैहिक विकारों के उपचार में तन और मन का उपचार किया जाना आवश्यक है. रोगी के मन में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण तथा भावनात्मक संतुलन बनाया जाकर बहुत सी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है.जीवन की हताशाओं और दुःख-विषादों को मन में कैद कर रखना या उन्ही के बारे में ही सोचते रहना, ठीक नहीं है.अत:भावनाओं कि घुमड़ अर्थात भावनाओं के उफान या सैलाव को बाहर आने का रास्ता मिलजाये, तो मन खुश/सुखी और तन स्वस्थ रखा जा सकता है.
मनोरोग एक सामाजिक समस्या
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार अवसाद या नैराश्य के भाव न तो किसी बाहरी विषाणु, जीवाणु या परजीवी के कारण से होता है और न ही यह मनुष्य को एकाएक अपनी गिरफ्त में लेता है. वास्तव में इसके बीज तो मनुष्य के अन्दर चिंता, उदासी, भय और असफलता जैसे भावनात्मक कारकों में विद्वमान होते हैं. और यही बीज मन को कहीं गहरे में आहत करते हैं. मन को चोट पहुँचाने वाले ऐसे सभी करक व्यक्ति की सोच को ऐसे चक्रव्यूह में फंसा सकते हैं जहाँ उसे चरों ओरहताशा और नैराश्य नजर आता है. यही सिद्धांत/प्रक्रिया उसे धीरे-धीरे स्थायी रूप से मनोरोगी बनाती है. इस प्रकार हम देखते हैं कि मनोरोग मानसिक कमजोरी का लक्षण या चिन्ह नहीं वल्कि स्वास्थ्य का का मुद्दा भी भी है, इसे सामाजिक समस्या मानते हुए चिकित्सा की विभिन्न विधाओं के जानकारों के साथ मिलकर हल किया जाना चाहिए.
कर्ज, डर, मनमुटाव, अवहेलना,एकाकीपन,अपराधबोध, आघात, प्रतिघात, प्रतिशोध, निराशा, क्रोध, प्रेम में असफलता, झगडे आदि कारक मनोरोगों एवं अवसाद के लिए जवाबदेह होते हैं. भीषण अवसाद के दौर में व्यक्ति आत्महत्या का भी प्रयास कर सकता है.
चिंता और तनाव नए ज़मानें में आमबात हो गई है,लेकिन इसकी अधिकता से व्यक्ति अवसाद का शिकार हो जाता है.वेतानिकों नें एक ख़ास तरह की जीन को डिप्रेशन के लिए ज़िम्मेदार बताया है.ब्रेन इमेजिंग के अध्ययन से इसकी पुष्टि हुई है.यह जीन मूड रेगयूलेटिंग सर्किट को कमजोर बनता है. भावनाओसे सम्बंधित मस्तिष्क में स्थित 'एमिग्डाला' और 'सिंगयूलेट'भी डिप्रेशन के लिए ज़िम्मेदार इस जीन से प्रभावित होते है. यह जीन मूड रेगुलेटिंग सर्किट को कमज़ोर कर देता है. इसलिए व्यक्ति पहले चिंता और फिर डिप्रेशन का शिकार हो जाता है.इस ख़ास जीन का असर भावनाओं, खासकर डिप्रेशन पर निश्चित रूप से होता है.
डिप्रेशन का मर्ज आगे चलकर उच्च रक्तचाप और विभिन्न ह्रदय रोगों का कारण बनता है.
डिप्रेशन एक ऐसा मनोरोग है,जिसमें व्यक्ति हमेशा निराशवादी विचारों से घिरा रहता है, वह उदासी में ही डूबा रहता है.
शोधार्थियों की राय में डिप्रेशन का स्वरुप जितना गंभीर होगा, उच्चरक्तचाप और ह्रदय रोग होने की जोखिम उतना ही ज्यादा बढ जाती है.डिप्रेशन मर्ज के चलते धमनियों के अन्दर अवरोध पैदा होने लगता है,जो आगे चलकर ह्रदय रोगों का कारण बनता है.
मनोरोगों का कारण जैव रसायनों (Bio Chemicals) का असंतुलन है,को कुछ अनुवान्सिक कारणों से भी होता है.कुछ में पारिवारिक एवं रासायनिक परिवेशगत कारण होते है तो कुछ में जीवन की विषम परिस्थितियों से उपजी अवचेतन मन की कुंठाएं एवं द्वन्द.
हमारा मंसिक्स्वस्थ जीन संरचना पर भी बोहोत अधिक निर्भर करता है, जो गर्भावस्था के प्रथम चरण में निर्मित होती है.तनाव विश्व की ज्यादातर बिमारियों का जनक है.डिप्रेशन जेसी खतरनाक बीमारी तनाव के चलते ही होती है.
मनुष्य के अपने मन की विकृतियाँ ही मानसिक रोगों का कारण होती है. अपनी सामान्य अवस्था से विचलित होना ही विकृति कहलाती है.मन की विकृति के कई लक्षण हैं,जेसे-
अत्यधिक चिंत या बेवजह का डर, बैचेनी और अनिद्रा, आवेशों की अधिकता, अवास्तविकता अथवा काल्पनिक विचारों में खोए रहना, असामान्य व्यव्हार, अपनी और अपने आश्रितों की देखभाल में लापरवाही, कमजोरी,थकन,निराशा और निरर्थकता का एहसास (ऊब,अलगाव,घृणा) भी अवसाद के लक्षण हैं.
इसके अतिरिक्त क़र्ज़,मन मुटाव,एकाकीपन,अपराधबोध,कुंठा,आघात,प्रतिशोध,प्रेम में असफलता,चिंता,भय,उदासी,निराशा,असफलता जेसे भावनात्मक कारकों में अवसाद के बीज होते हैं. तनाव - ग्रस्त व्यक्ति को अधिनिक चिकत्सा विज्ञानं के अनुसार डिप्रेशन, दुश - चिंता (anxiety),न्यूरोसेस एवं सिजोफ्रेनिया जेसे रोगों से गुजरना पड़ता है. ह्रदयघात एवं हाईपरटेंशन (एच.बी. पी.) हमारी रोज़मर्रा की छोटी-मोटी टेंशन का ही विकसित रूप होता है. एग्जिमा कुंठा / इर्ष्या का विकसित रूप है.
अधूरे व्यवस्था (unfixed-bussiness) ~> अव्यक्त क्रोध ~> व्यक्त क्रोध ~> तनाव ~> सतत तनाव ~> अवसाद ~> मानसिक ~> शारीरिक + भावनात्मक बीमारियाँ ~> ह्रदय रोग ~> उच्चरक्तचाप, मोटापा, मधुमेह, अस्थमा आदि.
Some observations in this 2012 text reflect research of that time. Please read it alongside current medical advice.
A Shared Responsibility
Mental illness is a social issue, not a weakness
Depression is not caused by a virus or bacteria, and it does not take hold overnight. Its seeds lie in worry, sadness, fear and a sense of failure that wound the mind deeply. Over time they trap thinking in a cycle where only despair is visible.
Mental illness is therefore not a sign of weakness. It is a health issue, and it should be addressed as a social problem, together with experts from different fields of care.
What do most doctors recommend?
Both body and mind need treatment. A positive outlook on life and emotional balance can resolve many problems. Holding life's disappointments and sorrows inside, or brooding on them endlessly, does harm. When emotions find a healthy way out, the mind becomes lighter and the body healthier.
How does stress affect immunity?
Research on the immune system shows that mental distress and inner conflict weaken the body's ability to fight disease. This imbalance is considered an important factor in many illnesses.
Where does Pranvakshar Dhyan fit?
In psychosomatic conditions, spiritual programming is applied to the unconscious mind. Pranvakshar Dhyan is that cleansing process. It complements, but never replaces, medical treatment.
This page is for education and self-awareness only, not diagnosis or treatment. If you or someone you know is in distress, call Tele-MANAS on 14416 (free, 24×7, in many Indian languages).