
अवसाद एक मानसिक बीमारी है। यह हताशा से उत्पन्न होती है। विद्यार्थी हो या किसान, हताशाग्रस्त मानसिक अवसाद से ग्रसित होकर वे आत्महत्या कर रहे हैं। इस पर सरकार के साथ समाज को भी गंभीरता से विचार करना होगा और उसे दूर करने के उपाय ढूँढ़ने होंगे। मनोचिकित्सकों का कहना है कि देश की 15 करोड़ की आबादी किसी न किसी प्रकार के मनोविकार की शिकार है। उनमें 80% से अधिक बीमारियाँ मानवीय चेतना की आंतरिक टूटन एवं घुटन के परिणाम हैं। श्री मुकेश मिश्रा ने इस विषय पर आलेख प्रस्तुत किया है और पारिवारिक एवं सामाजिक विखराव से बचने के उपाय बताए हैं।

बढ़ते मनोरोगों की आँधी एवं व्यक्तित्व-विकारों की बाढ़ वर्तमान युग की गंभीर समस्या बन गई है। वस्तुतः हम मानवीय चेतना के गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। हमारे देश की छह फीसदी से अधिक आबादी किसी न किसी प्रकार से मानसिक असंतुलन की शिकार है। न्यूरोसिस, साइकोसिस, सिजोफ्रेनिया जैसे विखंडन एवं विखराव के पर्यायवाची शब्द आज प्रचलित मुहावरे बन गये हैं। देश में लगभग 2 करोड़ लोग सिजोफ्रेनिया (व्यक्तित्व विच्छेदन) की बीमारी से पीड़ित हैं तो 5 करोड़ लोग डिप्रेशन (अवसाद) से, जबकि यह सरकारी आँकड़े हैं।
यदि वास्तविक पीड़ितों का अनुमान लगाया जाये तो छह फीसदी का सरकारी आँकड़ा कई गुना बढ़ जायेगा। कुछ समय पहले ही नई दिल्ली में भारतीय मनोचिकित्सा सोसायटी के सम्मेलन के दौरान चिकित्सकों का कहना था कि देश की 15 करोड़ आबादी किसी न किसी प्रकार के मनोविकार की शिकार है। एक सर्वेक्षण के अनुसार 80 से 90% बीमारियाँ मानवीय चेतना की आंतरिक टूटन एवं विघटन के परिणाम हैं। यही आंतरिक टूटन बाहरी व्यक्तित्व के विखराव एवं विच्छेदन के रूप में प्रकट होती है। दरअसल मानसिक विखराव की इन समस्याओं के प्रति हमारे समाज में अभी खुलेपन या स्पष्टता का अभाव है। मनोचिकित्सक के पास जाना एक तरह से पागल हो जाने का भय दिखाता है और लोग स्वयं को इस भय से बचाना चाहते हैं। हमारे देश में मानसिक समस्याओं के उपचार को लेकर अनिच्छा और सामाजिक कलंक की भावना जुड़ी है, जिससे देर और बहुत देर हो जाती है।
खंडित मानवीय चेतना के इस संकट के दौर में दार्शनिक, धार्मिक एवं वैज्ञानिक प्रत्येक स्तर पर कुछ न कुछ प्रयास चल रहे हैं, जिनकी परिभाषाएँ भी बहुत स्पष्ट हैं। दार्शनिक प्रयास प्रमुखतया बौद्धिक जुगाली तक सीमित हैं, इनकी व्यावहारिक उपयोगिता संदिग्ध बनी हुई है। धार्मिक प्रयासों की सीमा उनकी लकीरवादिता, हठधर्मिता, पूर्वग्रहों एवं अवैज्ञानिकता के कारण एक छोटे दायरे में सिमट जाती है। जबकि वैज्ञानिक प्रयास जैविक हेर-फेर (जैसे जीन परिवर्तन, क्लोनिंग आदि) तक सीमित होने के कारण अभी सतहों में ही भटक रहे हैं।
वस्तुतः मानवीय व्यक्तित्व मात्र जैविक रसायनों का संगठन भर नहीं है, बल्कि इसकी अपनी मनोवैज्ञानिक एवं उससे उच्चतर आध्यात्मिक सत्ता भी है। मानसिक स्तर पर मानवीय चेतना तथा व्यक्तित्व के अध्ययन, अन्वेषण एवं चिकित्सकीय प्रयासों में आध्यात्मिक मनोविज्ञान की भूमिका निःसंदेह रूप से उल्लेखनीय है।

मनोव्यक्तित्व उपचार एवं विकास की समग्रता के संदर्भ में चेतना के आधार (आत्मा) को भुला देना ही आधुनिक मनोवैज्ञानिकों की सबसे बड़ी भूल है और इसी भूल के कारण वह अपने लक्ष्य से दूर अन्यत्र पहुँच गया है। अतः चेतना अर्थात आत्मा-चेतना की सत्ता का अध्ययन इसका प्रमुख विषय होना आवश्यक है। मनोचिकित्सक अपने मरीजों का मनोविकारिक स्तर तक ही संतुलन ठीक कर पाते हैं, इससे आगे उनकी पहुँच नहीं हो पाती। आधुनिक मनोवैज्ञानिक विधियों की अपनी सीमाएँ और सिद्धांत हैं, जिनके द्वारा व्यक्तित्व विकारों को एक सीमा तक ही ठीक किया जा सकता है, किन्तु उनका सर्वांग उपचार यहाँ संभव नहीं है। सभी प्रकार की समस्याओं का समाधान आध्यात्मिक क्षेत्र द्वारा ही संभव है।
इस तरह आध्यात्मिक मनोविज्ञान (साइको-स्प्रिचुअलिज्म) सुपर चेतना को व्यक्तित्व के आधार मानते हुए व्यक्तित्व के सम्यक विकास की ठोस पृष्ठभूमि तैयार करता है। अवचेतन के परिष्कार की सुव्यवस्थित प्रक्रिया द्वारा अर्थात अवचेतन मन के शोधन की स्प्रिचुअल प्रोग्रामिंग द्वारा उस कार्य को प्रभावी ढंग से आगे बढ़ाया जाता है जबकि यह कार्य मनोचिकित्सा में आधा छूट चुका होता है।

इस तरह कहा जा सकता है कि जहाँ से आधुनिक मनोविज्ञान की परिधि समाप्त होती है वहीं से आध्यात्मिक मनोविज्ञान प्रारंभ होता है। अर्थात आधुनिक मनोविज्ञान से जो कार्य अधूरा छूट जाता है, उसे “साइको स्प्रिचुअलिज्म” अपने परामानसिक (सुपर कॉन्शियस) आधार पर मानव की समग्र प्रकृति को अपने हाथ में लेकर उसे अपनी पूर्णता तक ले जाता है।
“साइको स्प्रिचुअलिज्म” की पद्धति एवं प्रक्रियाओं में आधुनिक मनोविश्लेषण एवं मनःचिकित्सा की लगभग सभी पद्धतियों का समावेश है और इससे भी बढ़कर यह आधुनिक प्रक्रियाओं की तुलना में अधिक सूक्ष्म, कम यांत्रिक और विविधता में अधिक समृद्ध है। साइको स्प्रिचुअलिज्म की विभिन्न पद्धतियाँ मानसिक विकास की व्यावहारिक विधियाँ हैं।
यहाँ पर साइको स्प्रिचुअलिज्म का अर्थ आत्मा और परमात्मा अर्थात परम-आत्मा का अध्ययन है। आत्मा और परमात्मा केवल ज्ञान चक्षु (इंटेलेक्ट) से अनुभव करने की शक्तियाँ हैं, जिनको भौतिक चक्षुओं से अनुभव नहीं किया जा सकता। आत्मा और परमात्मा के साक्षात्कार के समय जो आनंद प्राप्त होता है, वह व्यक्तिगत अनुभव एवं विशुद्ध प्रतीति का विषय है। उसे न तो परिभाषित किया जा सकता है और न ही प्रयोगशाला में सिद्ध किया जा सकता है।

इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि जब आँखें खोलो, बहिर्मुखी बनो और प्रयोगशाला में सिद्ध करो तभी तक विज्ञान का अस्तित्व है और जब आँखें बंद करो, अंतर्मुखी बनो और अपने ही अंदर विराजमान (स्थित) परमशांतिमय परमात्मा को ढूँढ़ो, तब ही अध्यात्मवाद के यथार्थ को जान पाओगे।
आँखें बंद कर अंदर खोजने की प्रक्रिया में विज्ञान की पहुँच नहीं है। आँखें खोलने पर विज्ञान की पहुँच और आँखें बंद करने पर ज्ञान की पहुँच। यही आधुनिक विज्ञान और आध्यात्मिक मनोविज्ञान की सीमा रेखा है।
पश्चिम के मनोवैज्ञानिक मन के बहुआयामी व्यक्तित्व को तो समझने का प्रयास करते हैं, पर आश्चर्य इस बात का है कि मन को वश में करने की बात शायद किसी ने भी नहीं की। वे अवचेतन मन तक तो पहुँचे हैं पर “परामन” (सुपर कॉन्शियस) की ओर संकेत कम लोगों ने ही किया। उन्होंने मन को क्रियाशील चेतना एवं आत्मा को शांत चेतना के रूप में देखा ही नहीं है।
इसी वजह यह भी रही है कि अधिकांश मनोवैज्ञानिक दार्शनिक होने के साथ-साथ डॉक्टर (चिकित्सक) भी थे, इसलिए उनका मुख्य उद्देश्य मानसिक चिकित्सा पर ही रहा। मन को शांत कर सच्चिदानंद प्राप्त करने पर नहीं। यहाँ सच्चिदानंद का आशय eternal (सत), conscious (चित) तथा bliss (आनंद) से है। तथापि उनका इस विषय का अध्ययन एवं उनके विचार सारगर्भित एवं अनेक प्रकार से ज्ञानपूर्ण एवं जानने योग्य हैं।

वर्तमान परिवेश में मानवीय चेतना, विचार, इच्छा-शक्ति जीवन की आपाधापी में प्रवृत्त हो रही है। मानव के भीतर निरपेक्ष अशांति और द्वंद्व पसरा हुआ है। एक शोध से पता चला है कि हमारा मस्तिष्क प्रतिदिन 34 जी.बी. डाटा की प्रोसेसिंग कर रहा है और यही प्रक्रिया मस्तिष्क को ओवर-लोड कर रही है। इस बात का हमें पता चले या न चले, पर यह सत्य है कि हम आस-पास की दुनिया से कटते जा रहे हैं। आधुनिक मानव सारे तनाव अवचेतन में दबाता जाता है और बाहर चुस्त-दुरुस्त का मुखौटा ओढ़े रहता है और यही तनाव उसके शरीर के विभिन्न संस्थानों को कमजोर करता रहता है।
वस्तुतः मन और शरीर का बहुत गहरा संबंध है। भावनाओं, विचारों और कल्पनाओं का मन से सीधा और गहरा नाता है। यही वजह है कि व्यक्ति की भावनाएँ और विचार उसके शरीर पर बहुत गहरा प्रभाव डालते हैं और यही विचार एवं कल्पनाएँ हमारे शरीर की जैविक तथा रासायनिक प्रक्रियाओं को सक्रिय बनाती हैं। इन सक्रिय उद्दीपनों के माध्यम से ही “मस्तिष्क-संदेश” कोशिकाओं तक पहुँचते हैं, जहाँ से पूरे शरीर में फैलकर उसे एक सुदृढ़ चिकित्सीय गुणवत्ता प्रदान करते हैं।
आज तामसिक प्रवृत्तियाँ (काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ आदि) के कारण ईर्ष्या, द्वेष, भय, आक्रोश, लालच बढ़ते जा रहे हैं जो कि मानसिक तनाव को जन्म देते हैं और यही भाव सभी प्रकार की मनोवैज्ञानिक बीमारियों के द्वार हैं। यदि इनसे उपजे तनाव का शमन कर मन को शिथिल और स्थिर बनाया जाये तो मनोविकारों और मानसिक बीमारियों से मुक्ति संभव है। `मनोकायिक अर्थात मनोभाव से देह में उपजे रोगों का उपचार प्रणवाक्षर-ध्यान द्वारा अवचेतन-मन की शोधन क्रिया से संभव है, जिससे तन और मन के स्तर पर स्वस्थ रहा जा सकता है। मात्र शारीरिक उपचार ही रोग-निवारण के लिए पर्याप्त नहीं हुआ करता, अपितु शरीर के साथ-साथ मन का उपचार भी बहुत आवश्यक है।
वस्तुतः प्रणवाक्षर-ध्यान मन के उपचार की दवा रहित पद्धति है जिसमें मनोरोगी के मन के द्वार तक पहुँचा जाता है। शरीर के विभिन्न ऊर्जा केन्द्र अर्थात महत्वपूर्ण चक्रों के द्वारा संबंधित ग्रंथियों की कार्य पद्धति को व्यवस्थित करने में आध्यात्मिक मनोविज्ञान की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। शरीर के भीतर जो ऊर्जा केन्द्र मंद, बंद या असंतुलित हैं, उन्हें प्रणवाक्षर-ध्यान प्रक्रिया द्वारा आदर्श रूप में सक्रिय किया जाता है। फलस्वरूप विभिन्न जैव-रसायनों की अन्तःस्रावी क्रियाएँ सुचारू एवं संतुलित हो जाती हैं।

अधिकांश शारीरिक रोगों की उत्पत्ति के लिये विभिन्न ग्रंथियों द्वारा स्रावित होने वाले हार्मोन्स का असंतुलन जवाबदेह माना गया है। इस प्रक्रिया में बीटा एण्डॉर्फिन, डोपामिन, सेरोटोनिन जैसे विभिन्न आध्यात्मिक चक्रों से सम्बद्ध करते हुए प्रणवाक्षर अर्थात ॐ के ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत स्वरों में उच्चारण द्वारा इन्हें सक्रिय किया जाता है। परिणामस्वरूप ऑटोनॉमिक नर्व सिस्टम, एण्डोक्राइन ग्लैण्ड्स द्वारा स्रावित विभिन्न हार्मोन्स तथा अन्य जैविक रसायनों का स्राव संतुलित हो जाता है। मस्तिष्क के दोनों गोलार्द्ध व्यवस्थित एवं सुचारू रूप से सक्रिय हो जाते हैं। साथ ही चयापचय (मेटाबोलिज्म) की गति नियंत्रित होती है तथा कफ, पित्त एवं वात का मन के बुनियादी गुण सत्व, तम और रज के साथ साम्य स्थापित होने लगता है। जिससे मन का भय कम होता है तथा चेतन और अवचेतन जगत से साक्षात्कार होता है।

व्यक्ति को मानसिक द्वंद्व, कष्ट और तनाव से जहाँ राहत मिलती है वहीं उसका मानसिक कवच अर्थात साइकोलॉजिकल डिफेंस मेकेनिज्म मजबूत होता है। प्रणवाक्षर-ध्यान व्यक्ति के तंत्रिकातंत्र, हार्मोन एवं न्यूरोट्रांसमीटर को सक्रिय कर उनका नियमन करता है और खंडित मानवीय चेतना से मुक्ति दिलाता है।